हरदोई का बिलग्राम इलाका की शिनाख्त पूरी दुनिया में यही था शेरशाह सूरी वाह हिमायू का मैदान जंग यही के मंदिर में पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता ने खाई थी साथ जीने मरने की कसमें अपनी मिसाल आप है बिलग्राम के करीब इमामबाड़े वातारि की मस्जिद
जिला संवाददाता
हरदोई मुगलिया डोरे हुकूमत की यादें समेटे जिले का तारीखें कस्बा बिलग्राम अपनी तारीखी इमारत इबादत गाहो और आदबी शख्सियात के लिए पूरे मुल्क में ही नहीं बहेरी मुल्क में भी अपनी मुनफरद शिनाख्त रखता है सर जमीन बिलग्राम का ताल्लुक बड़े-बड़े औलिया अल्लाह शोरा अदबा के साथ मुगलिया हुक्मरानों से भी है। जिले का यह इलाका शेरशाह सूरी और हुमायूं के मुबीन हुई जंग का ही नहीं बल्कि पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की मोहब्बत का भी शाहिद गवाह है। यहां के कदीमी इमामबाड़े से तारीखी मसाजिद और जदीद तरीन मकबरे जितने मकबूल है इस एतबार से बिलग्राम इलाका गंगा जमुनी तहजीब का भी बेहतरीन नमूना है। रियासत उत्तर प्रदेश की दारुल हुकूमत लखनऊ और तिजारती ऐतबार से प्रदेश की राजधनी कहे जाने वाले कानपुर से तकरीबन 110 किलोमीटर के फासले पर कटरा बिल्हौर हाइवे पर गंगा किनारे स्थित हरदोई जिले का बिलग्राम को श्रीनगर कह कर याद करते हैं इसका नाम श्रीनगर से बिलग्राम होने से संबंधित कई तारीखी रिवायत मौजूद है जो रेकुबार राजा श्री राम बल देव और कदीमी मन्दिर बिल्लेश्वरी देवी मंदिर से ताल्लुक रखती है। तारीखी किताबों में बिलग्राम का नाम और यहां पेश आए तारीखी वाक्यात बेशमूल बिलग्राम युद्ध का अस गिरा तहसील के साथ मौजूद है। शहर बिलग्राम को वैसे तो तहसील का दर्जा हासिल है मगर तारीखी अहमियत इससे ज्यादा है। सन 1540 में शेरशाह सूरी और हुमायूं बादशाह के दरमयान इसी इलाके में जंग हुई थी जिसमे शेरशाह सूरी ने हुमायूं को शिकस्त फाश दी थी। यहां से जान बचाकर निकले हुमायूं ने पिहानी के जंगलात में पनाह ली थी इस जंग में बारिश होने के बाद हुमायूं को शिकस्त का मुंह देखना पड़ा था और एक कश्ती के सहारे गंगा नदी से होकर वहां से कुछ करके पिहानी के इलाके जंगलात में पनाह ली तारीखी अहमियत बयान करना है तो पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की मोहब्बत से सफर को कैसे नजरअंदाज किया जाए तारीखी शाहिद है कि विराज चौहान जब संयोगिता को लेकर कन्नौज से निकले तो सबसे पहले बिलग्राम शीतला देवी मंदिर पहुंचे और यही इन दोनों ने इजहार ए मोहब्बत करते हुए साथ जीने मरने की कसमें खाई थी इस वक्त इनके साथ चंद्र बरदाई और इनकी माशूका चकोरी भी थी बिलग्राम का यह मंदिर आज भी पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता के इश्क का गवाह है जो शादीशुदा नए जोड़े की अकीदत का अहम मरकज माना जाता है। तारीखी किताबों के मुताबिक इस इलाके के साथ कन्नौज व एतराफ़ के इलाके भी याद किए जाते हैं। यहां मुस्लिम नेतृत्व को आगे बढ़ाने में सुल्तान इल्तुतमिश का नाम सरे फेहरिस्त है। सन 1217 में वह कन्नौज पहुँचे और हरदोई में अपनी इराकी फ़ौज के सिपेह सालार शेख़ मोहम्मद सुगरा को भेजा सैय्यद सुगर इराक के मारूफ खानदान से ताल्लुक रखते थे। कहते है कि शमाली हिंदुस्तान में कई मारूफ सैयद खानदानों का ताल्लुक सैयद मोहम्मद सुगरा से ही है उसी में बिलग्राम का इलाका भी शामिल है 13वीं सदी में इराक से भी कुछ खानदान यहाँ हिजरत करके आए जिन के खानदान आज भी (सादात बिलग्राम) के नाम से मशहूर है सुगरा की नेतृत्व वाली फौज ने रेकवार के राजा को शिकायत देकर इस इलाके पर कब्जा किया। 1218 में सैयद मोहम्मद सुगरा के इंतकाल के बाद उनकी याद में सन 1230 में एक शानदार मस्जिद तामीर कराई गई जो इलाके भर में अपने किस्म की पहली मस्जिद के अलावा वहां के कदीमी तर्ज तामीर के बुलंद व बाला इमामबाड़ा अपनी मिसाल आप है यहां की जामा मस्जिद ऊपरकोट के अलावा मकबरे भी काबिले दीद है। बिलग्राम का बड़ा इमामबाड़ा और गैर जिलों तक मे मशहूर है यहां मोहर्रम पर मुख्तलिफ ताक़रीबत होती है। साथ ही इमामबाड़ा को अक़ीदतन जियारत के अलावा अदबी नजरिए से भी देखने वालों का हुजूम लगा रहता है। कई फिल्मसाज भी यहाँ लोकेशन वगैरा देखने का चुके है। इसमें कोई दो रये नही कि अगर हुकूमत क इंतजामिया जरासी नजरे इनायत कर दे तो अपना बिलग्राम परदा सतह पर नजर आयेगा । बिलग्राम की मज़हबी हैसियत शिया सुन्नी दोनों के एतबार से बड़ी अहम है। यहां मुगलिया दौरे सल्तनत में खास एक तलाश रहा यही वजह है कि यहां बादशाहों के जमाने की तामीर शुदा मस्जिद और आसार कदीमा के बेसर तमीरात है। इनमें मोहल्ला सुल्हाड़ा की 1042 हिजरी की तामीर शुदा बड़ी मस्जिद का तर्ज तामीर भी काबिले दीद है। तहजीब व तमद्दुन की आमजगह कहे जाने वाले बिलग्राम शहर को तहसील और कोतवाली का दर्जा हासिल है कोतवाली की बुनियाद सन उन्नीस सौ आठ में अंग्रेजों ने रखी थी इस इमारत में आज भी कोतवाली कायम है बाद में नगर पालिका परिषद का कयाम हुआ फिर तहसील बनाई गई हाल ही में आईटीआई और गर्ल्स कॉलेज की बुनियाद भी रखी गई है जो यकीनी तौर पर इलाका को समाजी इल्मी व अक्तसादी तरक्की से हम किनार कराएंगे आम घरानों में चिकन जरदोजी वगैरह का भी काम होता है। इस इलाके से गंगा नदी भी निकली है इसलिए सब्जियां कसरत से पैदा होती हैं जिनकी पहुंच गैर प्रदेश तक में होती है। साथ ही यहां के अमरुद भी दिल्ली समेत पूरे मुल्क में मशहूर है। मजहबी व अदबी हल्का की बात करे तो सर जमीन बिलग्राम ने ऐसे ऐसे उल्मा व शोरा व अदबा मुसन्नाफिन व सहाफी पैदा किये है जिन की तूती आज भी इल्मी हलक़ों में बोलती रही है। इन में मशहूर कवि रसलीन सैय्यद मुर्तजा जैदी सैय्यद गुलाम अली आजाद बिलग्रामी सैय्यद अबु मुत्तलिब समीत उल्मा व अदबा आज भी दीनी वाली खिदमात के साथ अदबी तख़लीक़ात के वजूद देने में मारूफ अम्ल हैं।
इन्सेंट बिलग्राम किताबो की तारीख पर एक नजर
आठवीं सदी हिजरी से सर जमीन बिलग्राम रूहानियत का मरकज बना कूफ़ा और बसरा के दरमियान हज़्ज़ाज बिन यूसुफ का आबाद किया हुआ शहर वस्त से सैयद मुहम्मद दावतुल सुगरा हिजरत करके देहली आये और देहली आने की खबर जब बादशाह वक़्त सुल्तान शमशुद्दीन इल्तुतमिश को मिली तो उनोहने बिलग्राम पर फौज कशी के लिए सैयद मुहम्मद सुगरा को सिपहसालार बना कर रवाना किया चूंकि सैयद मुहम्मद दावतुल सुगरा ख्वाजा बख्तियार काकी मुरीद व खलीफा थे और खुद बादशाह वक़्त सुल्तान शमशुद्दीन इल्तुतमिश ख्वाजा बख्तियार काकी के गिरोदीदा थे बाहम रब्त ताल्लूक की बिना पर सुल्तान शमशुद्दीन ने ख्वाजा मुहम्मद दावतुल सुगरा को बहुत से खेतों की अशरी का वसूली का हुक्म दे रखा था यह वाक़्या 614 हिजरी का है जब बिलग्राम को रूहानियत का मरकज़ बना दिया इसके बाद से आप अमन व सलामती का पैग़ाम बिलग्राम में आम किया और फिर बिलग्राम में औलिया और सुफ़्फ़ा व उल्मा की एक तवील जमात हर ज़माने में वजूद पाती रही ।यह ज़रखेज़ी इतनी अहम है कि वक़्त के अहम इमामुल सूफिया मजदाद वक़्त अल्लामा क़ाज़ी सैयद मीर अब्दुल वाहिद बिलग्रामी जो सैयद मुहम्मद दावतुल सुगरा की औलाद में से हैं और यहीं के वतनी हैं इससे क़ब्ल बिलग्राम के अव्वल बुजुर्ग ख़्वाजा अमाउद्दीन चिश्ती है जो बिलग्राम आये और उस वक़्त के ज़ालिम बादशाह बलदेव का मुकाबला किया और उसको शिकस्त दी तमाम वास्ती सादात के ज़द आला सैयद मुहम्मद दावतुल सुगरा के औलाद में एक से बढ़ कर एक उल्मा सुफ़्फ़ा पैदा हुए।इन तमाम औलादों में ग्यारहवीं सदी के मज़दाजम मीर सैयद अब्दुल वाहिद बिलग्रामी का मुकाम बहुत ही बुलंद व आला हैं मीर बिलग्रामी की औलाद से ही सैयद अब्दुल जलील हैं जिन से मरहरा का नस्ब जारी हुआ नेज़ मीर बिलग्रामी के एक साहबजादा अल्लामा क़ाज़ी मीर तैयब हैं।नेज़ मीर तैयब की इल्मी खुदादाद सलाहियत और इल्म के क़ायल खुद मुहद्दिस आला अलताक अल्लामा अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी हैं।
